बुधवार, 11 जून 2014

तुम्हारे लिए !

             
    कवि लंबे समय से तनाव और दुःख में चल रहा था। दिन-ब-दिन उसकी निराशा  बढ़ती जा रही थी। आखिर एक दिन उसे लगा कि ये संसार रहने काबिल नहीं है। शांति  और मुक्ति का एक मात्र मार्ग मृत्यु ही है। उसने आत्महत्या का निश्चय किया। बाजार से रस्सी ले कर लौट रहा था कि मंदिर दिख पड़ा। मन हुआ कि चलो आखरी बार जगदीश्वर  से रू-ब-रू हो लिया जाए।
            जगदीश्वर घूप-अगरबत्ती के घुंए में बैठे थे। नारियल के पानी से मिल कर बासी फूल-पत्तों से दुर्गन्ध आ रही थी। प्रसाद के मीठे से आसपास चीठा हो रहा था। धुंआए गर्भगृह में बल्ब की कुंद  रौशनी घुटन पैदा रही थी। कैसे जी रहे हैं जगदीश्वर !! कवि को लगा कि किसी तरह इन्हें भी मुक्ति का मार्ग पकड़ना चाहिए।
‘‘ कैसे आना हुआ कविराज ?’’ ध्यान गया तो जगदीश्वर ने पूछा।
‘‘ तंग आ गया हूं तुम्हारे इस संसार से। अब सहन नहीं होता मुझसे। मैंने तय कर लिया है कि अब आत्महत्या करूंगा। ’’ कवि ने नई खरीदी रस्सी दिखाते हुए कहा।
‘‘ ठीक है, कर लो। ..... मरने के बाद मैं तुम्हें अपने पास बुला लूंगा। हम दोनों यहाँ साथ ही रहेंगे। .... जाओ, जल्दी मरो । ’’ जगदीश्वर ने प्रसन्न हो कर आज्ञा दे दी।
कवि बाहर खुली हवा में निकला ...... और मयखाने में जा कर बैठ गया। जाम आया तो थोड़ी सी शराब छलका कर बोला - ‘‘ जगदीश्वर ...... तुम्हारे लिए। ’’

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2 टिप्‍पणियां:

  1. अफसोस, काफी देर से आपके ब्लॉग को देखा। लघुकथाएं मुझे बहुत पसंद हैं। सचमुच बहुत ही अच्छा लिखते हैं सर आप.................

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