बुधवार, 6 अगस्त 2025

भक्तासुर


 


          रात के तीसरे पहर में जगदीश्वर चुपके से दौड़े चले जा रहे थे कि एक मिडिया मेन की नज़र पड़ गयी। बोला" कहाँ भागे जा रहे हो जगदीश्वर?

        "महिना भर से मुझ पर पानी ढोल रहे हैं! न दिन-दिन देख रहे न रात! ... अब बर्दाश्त नहीं होता है ।" वे बोले ।

     "तो मना कर देते ना ।" पत्रकार बोला ।

     "सरकार फूल बरसा रही है, पुलिस पैर दबा रही है तो मना करने से मानते क्या?"

     "लेकिन अब तो महिना ख़त्म हुआ ।"

       "तो दूध दही वालों ने मैदान पकड़ लिया । कल भक्तों ने इक्कीस किलो आमरस से नहला दिया! दूसरे भांग ठंडाई कूड़ गए, कुछ लोग शहद चुपड़ जाते हैं! ये कोई तरीक़ा है प्रसन्न करने का!"

        "भक्त हैं आपके । आनंद लीजिये और उनका कल्याण कीजिये ।"

        "भक्त नहीं, भक्तासुर हैं । जाने दो मुझे । भरपाया मैं तो ।" जगदीश्वर दुखी थे ।

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रविवार, 27 जुलाई 2025

शामिल बाजा


 


"आत्मा का पुर्जन्म अभी नहीं हुआ है। वह अभी भी एक पेड़ पर लटक रही है वर्ष भर से ।" पंडित जी ने पोथी पन्ने पलटते हुए कहा।

"लेकिन मृत्यु के बाद के सारे कराज तो आपने करवा दिए थे!!" प्यारेलाल बोले। 

"इसलिए तो भटक नहीं रही है। पेड़ पर लटकी है आराम से।" 

"कुछ चूक रह गई होगी। जवान मौत का विधान जटिल होता है।" घर की बुजुर्ग महिला ने पंडित का समर्थन किया। 

"आप ठीक कह रही हैं माता जी। "

"अब क्या करें पंडित जी?" प्यारेलाल चिंतित हुए। 

"गाय और बछड़े का दान लगता है ऐसे में ..."

प्यारेलाल गाय और बछड़े के दाम पर विचार करने लगे। 

"आत्मा कहीं भी अटकी हो तो गाय से वैतरणी पार करवा देने का विधान है। आगे जैसी आपकी इच्छा।"

" जो भी विधान हो उसे पूरा तो करवाना ही पड़ेगा पंडित जी।" बुजुर्ग महिला ने कहा। 

" और कोई खर्चा तो नहीं है? " 

" गोदान विधि पूर्वक होगा, ग्यारह या इक्कीस ब्राह्मणों को भोजन, वस्त्र, आसन, ताम्रपात्र और मुद्रा आदि देने के साथ गोदान करने का विधान है। गाय में ईश्वर का वास है सो दान के पहले उसे छप्पन भोग खिलाना होगा। यही भोज ब्राह्मण देवता की ग्रहण करेंगे।" विधान सुन कर प्यारेलाल और चिंतित हो गए। 

"उनको लटकते हुए छोड़ तो नहीं सकते ना। " अंदर से एक महिला स्वर सुनाई दिया। 

" गाय को अच्छा चारा खिला दे तो नहीं चलेगा? " प्यारेलाल ने छप्पन भोग से बचने का प्रयास किया। 

" चारा गाय खा लेगी ब्राह्मण कैसे खाएँगे !!... एक थाली में थोड़ा-थोड़ा रखकर निमित्त रूप में खिलाया जाएगा। गाय को भरपेट खिलाने की आवश्यकता नहीं है।"

" किस दिन यह सब होना है पंडित जी? " बुजुर्ग महिला ने पूछा।

" जितना शीघ्र हो सके कर ले पंद्रह दिन बाद ग्यारस है,उस दिन कर लीजिए।"

 प्यारेलाल हां और ना के बीच अभी भी झूल रहे हैं। 

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बुधवार, 9 जुलाई 2025

बकरा कटेगा और बंटेगा


 



 *तुम कौन हो बकरा जी ?

 - बकरा हूँ जी।

 *कौन बिरादरी हो कौन जात हो तुम? धरम क्या है? 

 -कोई धरम जात नहीं मालिक, मैं सिर्फ बकरा हूं, आप सेक्युलर कह लीजिये। 

 *लेकिन तुम्हारी दाढ़ी!! 

 -दाढ़ी तो कुदरत ने दी है।

 *तुम्हें मालूम है तुम कटोगे तो बंटोगे । 

 -बंटने का तो मालूम नहीं साहब लेकिन कटेंगे जरूर। कोई बकरा अपनी मौत नहीं मरा आजतक। मौका मिला तो हमने पालपोस कर गाँधी दिया, अहिंसा का पुजारी। लोगों ने धन्यवाद नहीं दिया, काट दिया। 

 *गांधीवादी हो इसलिए कटते हो। कटो मत। 

 -कटना हमारे हाथ में कहाँ है साहब। 

 *अब वक़्त कि पुकार है, हम कटने वालों को एक करना चाहते हैं।

 -तो मालिक हमें बराबरी का दर्जा दे सकते हो? देना चाहते हो?

* बराबरी को बीच में मत लाओ। बराबरी अलग चीज है और कुटाई कटाई अलग चीज है। अगर सबको बराबर कर दिया तो हम क्या हुए!  ऊँच नीच का का मामला तो सिस्टम में है । सिस्टम के समर्थक तो तुम्हारे गाँधीजी भी थे। 

 - अगर बकरे एक होने को राजी नहीं हुए तो? 

* तो उन्हें हम ही काट देंगे।

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